आमंत्रण
सूनी चांदनी रातों में
सूनी चांदनी रातों में
अक्सर
दस्तक देता है कौन,
चाहे अनचाहे मेरी
यादों को
खींचता रहता है कौन,
द्वार खोलने उठती हूँ
किसी को न पाकर
वापस लौट आती हूँ
होकर के निराश
सदियाँ कितनी बीत गयी
वो न आया मुझ तक
न उसने मुझे बुलाया
चाहतों के इस विकट जाल में
मैंने स्वयं को भी गुमया
इन्ही चांदनी रातों में
करते इंतजार …
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-- चंद्रलेखा --
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-- चंद्रलेखा --